Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Tuesday, 23 July 2019

वासवदत्ता ( Vasavdatta )

Transliteration from original English "  Vasavdatta "   [ dt 10  Aug 1970 ]

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वासवदत्ता   /  22  July  2019

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घनी ,अँधेरी रात में
तूफ़ान उट्ठा ,
सून कर बादलों की गरज ,
देख बिजलियों की चमक ,

दिल में वासवदत्ता के
उठी एक आंधी  ;

तय न कर पायी
क्या मचल रहा था ज्यादा ,
हवा ओ मे झूमता
क्षिप्रा नदी का पूल
या ,
अरमाओ की आंधी से मचलता
आँचल तले , अपना ऊर  ?

पूल के उस पार
खड़ा था प्रीतम ,
बांसुरी के सूरो से
कर रहा था बेताब ,
बेचैन ,
उस रात को
प्रीतम  !


चलो जल्दी ,
वासवदत्ता ,
समय बिता जा रहा है
वासवदत्ता  !

चलो आहिस्ता , आहिस्ता
धीरे कदम , धीमे कदम
न कोई रुकावट राह में
पीछे छोड़ के  आँगन ,
जरा तेज भागो
जरा दोड़ो ,
वासवदत्ता  !

'गर काजल
तेरी आँखों के बजाय
लग भी गया गालो पे ,

और ,

बिन सँवारे ज़ुल्फ़े को
अनिल चूमता रहे ,

तो चूमने दो , वासवदत्ता ,

कब तक इंतज़ार करेगा , प्रीतम ?

कैसी भयानक है ये रात  !

कितना डरावना है , हवा का चीत्कार !

'गर पानी से भरी है तेरी राहें ,
मत उठाव पल्लू ,
और अगर बरखा ने भिगो दिया तेरा दामन ,
भीगने दे !

पहुँच कर क्षिप्रा तिरे
बोली वासवदत्ता ;

"  जिसके सुरों से
पागल हो रही हूँ ,
वो बांसुरी को मत बजाओ ,

प्रीतम ,

जिस बिरह की आग में
जल रही हूँ
उसे मत बढ़ाओ   ;

पर ये कौन रुक रहा है
राह मेरा ?
किससे टकरा रहे है
पैर मेरे  ? "

तब
दामिनी की दमक में देखा
एक हसता हुआ चहेरा ;

संभाल साँस को बोली
वासवदत्ता ,

"  कौन हो तुम ?
और इस भयानक रात में
क्यों लेटे हो ज़मीं पर तुम ? "

तब अजनबी बोले :

"  नाम है मेरा , उपगुप्त ,
कर्म से हूँ , साधू  ;
धरती को बना लिया मेरा बिस्तर ,
और
आसमां की ओढ़ चादर
गोद में हरियाली की
लेटता हूँ "

सुनकर बोली , वासवदत्ता  :

"  मुझे माफ़ कर साधू ,
तेरे बदन को
पैरों से छुआ इस लिए  ,
क्षमा कर , साधू ;

बिनती करू
बनो आज रात , महेमान मेरे ,
तो
पाप का प्रायश्चित करू
साधू  !  "

हंस कर बोलै , उपगुप्त  :

" वासवदत्ता ,
आज की रात मेरे नसीब नहीं ,
वादे किये तूने
जिस प्रीतम को ,
जाके कहो उनसे ,
आज की रात तेरे लिए है  !

पर मैं लौट के आऊंगा ,
और उस दिन
वादा मेरा निभाउंगा ,

आज तो किया जो वादा
इस धरती को ,
बस
वही निभाउंगा  !  "

फिर समय की धारा
बहती चली ,
आने वाली हर पल ,
जा कर अतीत में
खोती चली  ;


बरसो बिते,

और एक पूरनमासी की रात
क्षिप्रा के तरंगो पर होके
हलकी हवा चली  ;

तब उपगुप्त
वही राह से निकला ,

देखा ,
मिली थी जहाँ वासवदत्ता
पहेली बार ,
वहीं लेटी  थी जमीं पर ,

लेकर कोई असाध्य रोग ,
बुला कर मौत को
कराहती थी
वासवदत्ता  !

तब ज़ुकके
कानो में बोला उपगुप्त :

" देखो
वासवदत्ता ,
मेरा वादा निभाने
मैं आ गया हूँ  "

गुनगुनाई वासवदत्ता :

मुझे मत छुओ , साधू ,
कुष्टरोगी को मत छुओ ;

मेरे पापो का घड़ा भर चुका है ,
अंतकाल मेरा , आ गया है  !

मेरे चाहनेवालों ने
मुझे ठुकरा दिया है

मुझे शर्मिंदा मत करो , साधू  ! "

तब बोलै उपगुप्त :

" काल तो मेरा भी आया है ,
किया था जो तुज़से वादा
वो निभाने की रात
आ गयी है ,
कभी ख़त्म न होने वाली
हमारे मिलन की
सुहागरात लायी है  ,

आभमे सितारों की है चमक ,
फ़ज़ा में लहराती है
फोरम फूलों की ,

क्या , सून पाती हो
मेरी बांसुरी के सुर ?

आज मेरे साथ गाओ
वासवदत्ता ,

मधुमिलन की सुहागरात
आज
मेरे साथ मनाओ ,
वासवदत्ता  !

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