Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 10 June 1977

बाकी रही बात


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ख़ुदकुशी करके भी क्या
तुम तक पहुँच पायेंगे  ?

बाकी रही बात
सांस लेने
न लेने की  ;

ऐसे तो मेरी मौत को
काफी दिन बीत चूके है ,
ज़माने के लिए
खबरे अभी छपेंगी  

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10  June  1977


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Friday, 3 June 1977

इकरार रात की ?



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क्या मान भी जाओगी
अगर बता दू ,
सपने में कल रात
तू ने मुज़से प्यार किया  ?

और बार बार किया ,
जिसका
दिनभर बस इनकार किया  ?

और मान भी जाओ तो,
क्या कर पाओगी
बात रात की  ?

दिन में
क्या दोहराओगी
इकरार रात की  ?

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03  June  1977


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शेष प्रश्न



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क्या तुम जानती हो
जिस सुख की तुम अधिकारिन हो ,
जिसे देने
सिर्फ मै ही काबिल हूँ  ;

इसी सुख से
सदा वंचित रहेना
तुम्हारे भाग्य में ,
मैंने
क्यू लिख दिया  ?

क्यू  ?

तुम कैसे जानो  ?

जब की ये
मेरा ही शेष प्रश्न होकर
रह गया  !

जानता हूँ तो ये की ,
तुम भी तो ना
दे पाओगी मुज़े
जो तुम चाहोगी ;

बेबश हो रह जाओगी ,
और कभी
दो बूंद आंसू
कर्तव्य के बोज़ के आँचल तले
बहा लोगी !

पूछने तक भी ना पाओगी ,

क्या
तुम्हारी खामोशी का बोज़
मेरे सीने पर
मै  उठा शकुंगा ?

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03 June  1977


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Saturday, 28 May 1977

कहाँ तक छिपा रक्खोंगी ?



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तुम्हारा प्यार
रात के काले बदन पर छाये हुए
सफ़ेद बादलो सा ,

जो बहुत चाहे
किन्तु
बरस ना पाए ,

सिवा की एक दो बुँदे
तुम्हारी
सहमी हुई मायुशियो के  ;

ये क्या बुजाये
मेरे सीने में लगी जो आग
मेरे प्यार की प्यास  ?

तुम्हारा प्यार
तुम्हारी खामोशियो में
कहाँ तक
छिपा रक्खोंगी  ?

क्या आग से
आग को
बुज़ा  पाओगी  ?

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Wednesday, 18 May 1977

मैंने कभी छुआ था

मेरे  अस्तित्व से
जिन्हें जो चाहा
उन्हें वही मिला ;

तुमने चाहा
मेरे स्वत्व  की आहूति
जो तुम पा चुकी हो  ;

बहुत दिन बीते
किसीने
दिल के बदले दिल मोल लिया ,
मुज़े  रुनाणुमूकत  कर दिया  !

ब़ाकी रहा मेरा जिस्म
जो
न तो तुमे चाहिए
ना उन्हें  -

चाहिए
शमशान में
अपेक्षित एक
लकडियो के ढेर को ,
इन्हें मिल जायेंगा  ;

मेरे अस्तित्व का
बाकि कुछ
ना रह पायेगा  !

'गर हो शके तो
बहा देना
यादो को भी --

की
मैंने कभी
छुआ था
किसीके प्रानों को भी  !

बचने ना पाए
आश्लेष के निष्वाश  .

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         18   May  1977 


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Friday, 13 May 1977

जीवन की गुमराहो में

काश  !
मै कबूतर होता  !

ह्रदय की  गहराइओ के
सागर से अपरिचित ,
हवाओं के जोंको पर पंख पसारे
नील गगन में उड़ता  ;

होता भी मै तोता ,
काश ! एकलौता
दूर का राही
अकेला ;

आश छोड़ कर
हमराही की ,
जीवन की गुमराहो में ,
कहाँ , कभी , क्यू
रुक जाता ,
रैन बसेरा कर पाता ;

काश !

मुज़े ना पुकारती
मधुबन की मंजिले

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Lonavala
13 May 1977 


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