Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Wednesday, 20 December 1978

तुम कहाँ हो ?


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तुम्हारा बसेरा
मेरे ह्रिदय में है
ऐ जानते हुए भी ,

सोचता रहेता हूँ
तुम कहाँ हो  ?

       कभी मेरे हाथ को
       लिया थाम भी तो तुमने ,

न पूछा
कहाँ हो  ?

     जीसे महसूस करता हूँ
     वो तुम नहीं
     प्रियतम नहीं ,

मेरे रूह की महफ़िलो में
स़रिक हो शके ना
वो जिस्म है  ;

     तुम नहीं


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Sunday, 10 December 1978

बचा ना बहाना


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तुम्हारे सिवा
बचा ना  बहाना
जिन्दगी का  --

मगर ये भी कोई जिन्दगी है
जिसे ,
सहारा तुम्हारा ना  मिला ?

सूला ना शको
तुम्हारी गोद में
गिला हम क्या करे ?

सुलादों मौतके साये ,
लोरी कोई ऐसी सूना दो
आखरी नींद आवे  ;

बहाना अगर तुम बन शकी  ना
जिन्दगी का ,

क्यों ना तुम बन शको मकसद
हमारी मौत का ?


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Sunday, 19 November 1978

ज़माना क्या गायेगा ?


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मेरे कवित
जब हो शके ना
तुम्हारे गीत ,

ज़माना क्या गायेगा  ?

        उठी ना तर्रन्नुम
        तुम्हारे ओठ से ,

उंगलिया तुम्हारी
क्यूँ रुक गई
छू कर
मेरे ह्रदय के साज़ को  ?

        ज़माना क्या दोहरायगा
        तरज़ लिखही जो मैंने  ?

रहे खामोश पायल
जब तुम्हारे ,

छोड़ के कवित मेरे
बेसहारे

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19  Nov   1978


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Sunday, 12 November 1978

खामोशी से क्यूँ भरते हो


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तुम ना आओंगे
ये भी क्या सच हो शकता है  ?

कभी
बहुत कम कभी
तो मिलते हो  !

       कौन सी थी वो
      आखरी बार ,
      मिलाके आँख से आँख
      आपने देखा था ?

जब गम्मों  से हम ना डरे ,
मिलन की वो चन्द घडियां
खामोशी से क्यूँ भरते हो  ?

        मेरी - तुम्हारी
        और कौन सी दुनिया है  ?

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Monday, 6 November 1978

कौन रोकेगा मुज़े


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चाहा अगर मुक्कदर ने
मिले ना तुम्हे इस जहां में ,

कौन रोकेगा मुज़े
मौत की मंज़िल पर
मिलने से तुम्हे  ?

वादा नीभाओंगे  ?


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Monday, 30 October 1978

जो वादे तुमसे किये है


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अकेला हूँ

      मुज़े समज़ने की
      कोशिश मत करो  --

क्या आसमान
किसी की रहम पर
जीता है  ?

      तुम्हारे साये के
      अँधेरे में
      चला जा रहा हूँ ,

तुम्हारे लिए
क्या येही काफी नहीं  ?

      कभी सोचता हूँ ,
     क्या तुम शमा हो के
     जलना पसंद करती  ?

जब खुद
तुम्हारे दिए की
बाती न बन पाया ;

      बेमुनासिब इन सवालातो से
      तुम्हारे गमो को
      क्यूँ छिडकता हूँ  ?

मेरे गुनाहों की सज़ा
मुजे मिलने दो ,

तड़पती हुई तन्हाइओकि
आगमे
मुज़े सुलगने  दो ;

      कसूर मेरा है  --

      मुहब्बत की कसमे मैंने खायी है ,

      जो वादे तुमसे किये है
      वो पूरे हो जायेंगे  --

इससे बढ़कर
मुजको समज़ने
बेकार बाते मत करो


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दिवाली

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Monday, 9 October 1978

मैं क्यूँ पह्चानु ?


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तुम मेरे खयालो में
तड़पती हो
येही सोच के
मै
जीता हु !

मेरे ख्वाब के संसार को
सवांर ना शको तो
ना ही सही  !

उजाड़ना नहीं ;

     हो शकता है
     जो फूल तुमने मुज़े दिए
     वो कागज़ के हो --

मैं क्यूँ पह्चानु ?

क्या तुमने पहचाना
रंग ,
मेरी आँख के आंसू ओ का  ?

     हो शकता है
     वो
     मेरे जिगर का खून हो  ! !

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09  Oct  1978

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Friday, 6 October 1978

पल्ला मेरा जूक़ जायेंगा


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उठाओगी तराजू  ?

      मेरी नि:सिम  वेदनाओको
      तुलने
      तुम्हारे पास है क्या  ?

 जिसे रखहा है संभल
जिम्मेवारी की गठरिया ,
ऊपर उठ जायेगी  ;

      पल्ला मेरा जूक़ जायेंगा  ;

आँख से गिरा जो
पल्ले में ,
आहके दो
बदनसीब आंसू

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06  Oct  1978

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Thursday, 5 October 1978

न मिले राहबर


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धुन्ढ़ते धुन्ढ़ते  तुम्हे
खुद हुआ गुमराह ;

उठाये आँख आभ की और
रातभर खोजता रहा

तारक दो
तुम्हारे नैनन के  !

न मिले राहबर  --

सोचता रहा ,

पिया बिन क्या
बित जाएगी
रैना  ?


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Saturday, 30 September 1978

तो तुम्हारा क्या कसूर ?


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हमने जो चाहा
जब जब चाहा ,

ना मिला ,
तुम्हारा इस में क्या कसूर ?

      तुम नसीब थी ;

      दो ही कदम आगे थे
      हम तुमसे --

खड़े होकर , पकड़ना था
हमें तुम्हारी कलायियो  को ;

      हम चलते रहे
      तुम्हारी - मेरी राहें ना मिली ,
      तो तुम्हारा क्या कसूर ?

अब तुम कहाँ नसीब ?

      कुछ ज़माने के असूल है ;

      ख्वाब जो हमने देखा
      कुछ तुम्हारी
      कुछ मेरी , भूल है



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Tuesday, 19 September 1978

तुम्हारे बिना


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तुम कहेती हो

" तुम्हारा
  मेरे जहां से ,
  कोई वास्ता नहीं " ;

मैं सोचता हूँ ,

" तुम्हारे बिना
  मेरा तो कोई
  जहां ही नहीं  ! "


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Saturday, 16 September 1978

कौन है हम


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तुमे ना ही सही
मुज़े चाहिए
खुद की वफ़ाओ के सबूत  ---

दिल्फरोशो की दुनिया में
कौन है हम ,
फरहाद शीरीं के ,
के है हम फ़ालतू  ?


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Tuesday, 12 September 1978

फिर क्यूँ रुके रखहा है


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तुम जानती हो
खुद तो हमारी हो नहीं शकती -

फिर क्यूँ रुके रखहा है
हमें ?

हमारे  लहू से
मौत की तो मांग भर जयींगी !



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Tuesday, 4 July 1978

तुम्हारे इकरार के सहारे


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बहाना बनके बहारे
ना भी आयी तो
क्या हुआ ?

बिराने में भी हमने
तुम्हारे ही तो
ख्वाब देखे है  !

      कभी हम चले
     तुम्हारे प्यार के सहारे ,
     मज़धार में है
     तुम्हारे इकरार के सहारे  ;

मिला क्या हमे ?
ना पूछो --

आपने खुद क्या दिया है
आप जानो !

      हम तो सबकुछ दे चुके हैं ;
      बचे है जो
     सांस दो चार
     वो भी मिल जायेंगे ,

देखलो करके
एक बार
इनकार  !


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Wednesday, 21 June 1978

शिकवा नहीं


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प्रिया बेरहम ?

शिकवा नहीं ;

मेरा - तेरा
रहेमवाला
नाता नहीं  ;

शिकायत है भी तो
खुद से ,
खुदा से ,
अमावस की हर
खुदकशी से ;

उठकर
बेवफ़ाइओ की
गहराइओ से ,

दामन तक तुम्हारे
पहुँच ना पाऊंगा

तो रहम ना --

     तुम्हारी आँख से
     उठते हुए
     शोले - नफरते
     चाहूँगा।

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21  June  1978



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Tuesday, 20 June 1978

शमा भी तो जली है।


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हमें क्या चाहिए ?

हमें क्या पता  !

हमारी ख्वाहिसों  के मकबरे
पुराने हो चुके है  ;

तुमसे गिला क्या करे ,
जब हम हमारे न रहे --

न लेना , न देंना
मेरे - तुम्हारे रिश्ते में ,

बचा है केवल
सांस का आना जाना  ;

अब बरसों कहाँ बाकी है ?

जले है पंख अगर
परवाने के ,

शमा भी तो जली है।



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Saturday, 10 June 1978

वहीँ मिल जाउंगा


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इस डगर में
इतना ही साथ मिल जावे ,
--------- काफी सम्ज़ुंगा ;

फिर मौत के उसपार की
लम्बी सड़क पर आ जाना

वहीँ मिल जाउंगा

अब इजाजत हो तो सो जाऊ


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Sunday, 4 June 1978

साथ निभाओंगे ?


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अब इजाजत हो तो
सो जाये ,

तुम्हारे ख्वाब में
खो जाए ;

जीते है
( जीते है ? )
इस हकीकत से अलावा
मुमकिन यही है
सोना - रोना ;

सुपनो की दुनिया में रहेने वालो का
क्या पता ?

मुरादे जो पूरी हो गई
वो क्या मुराद ?

फिर भी पूछता हु ,
जवानी की बहारो में
हमसफ़र ना हो शके तो क्या ?

गमो की सफ़र
बहुत कुछ बाकी है

साथ निभाओंगे ?

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Friday, 5 May 1978

एक और भी बहाना है



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हो भी शकता है
तुम्हारी बेवफ़ाइओ
शायद तुम्हारी
बेबसी ही हो  !

हो भी शकता है
मगर
हमारी बेव्फाइओ का
कोई जवाब ?

ये के हम  कृष्ण है ?

     लिपटते हुए हर अंग के
     संगमे
     देखते है तुम्हारे स्वप्न  ?

एक और भी बहाना है
है हमारा ,

इन बेवफ़ाइओ है
हमारी जिस्म को
रूह से
अलग करने वाला तराना ,

     -  जहाँ मौत को छू  कर
        बार बार
        वापस चले आते है
        हम


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Wednesday, 1 March 1978

आश का पंछी ?

बादल हूँ मै
उड़ा जा रहा
जहाँ ले चले पवन  ;

टकराता कभी
पहाड़ की चट्टानों से ,
तो कभी लहेराए
मेरे साए में उपवन  ;

और कभी
बहुत कम कभी ,
जाके बरस जाता हूँ
रेगिस्तान में  ;

आखिर
मेरा भी तो कोई नाता है
ज़मी से ,
तुम जो ज़मी पे खड़ी  हो
सीना उठाये आभ की और  ;

क्या तुम्हारे ह्रदय में
छिपा है
आश का पंछी  ?

तद्पदाता
पंखे
फद्फदाता ,

कोई
बादलों का आशिक
दो बूँद का प्यासी  ;

किस बेबशी से
इन्हें
पकड़ रख्हा है  ?

क्या तुम्हारा नाता
ज़मी से अलावा
किसी से नहीं  ?

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01 March  1978


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क्या तुमारा नाता

बादल हु मै
उड़ा जा रहा
जहां ले चले पवन  ;

     टकराता कभी
     पहाड़ की चट्टानों से --

तो कभी लहराए
मेरे साये  में उपवन ;


     और कभी ,
     बहुत कम कभी
     जा के बरस जाता हूँ
     रेगिस्तान में  ;

आखिर मेरा भी तो कोई नाता है
ज़मी से ,
तुम जो ज़मी पे खड़ी हो
सिना उठाये आभ की और  --

    क्या तुम्हारे ह्रदय में
    छिपा है
    आश का पंछी  ?

तद्पडाता ,
पंखे फड्फादाता

    कोई बादलो का आशिक
    दो बूँद का प्यासी ?

किस बेबसी से
इन्हें
पकड़ रखहा है ?

    क्या तुमारा नाता
    ज़मी से अलावा
    किसी से नहीं  ?

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Sunday, 12 February 1978

मंजिले मिट जायेंगी ?


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बहुत देर करदी
प्रिया ,

मेरा सूरज ढलने चला ,
फिर शाम
फिर रात  :

फिर मौत तुम्हारे इंतज़ार की  ;

क्या पता
कौनसी मजबूरीने
थाम रख्हे है
तुम्हारे पैर  :

चलते चलते
ऐसी कौनसी मंजिले
मिल गई तुम्हे
हम क्यूँ पूछे ?

खामोशी के सहारे सहारे
हम तो पहुँच जायेंगे
हमारी मंजिल  ;

हो न पाओ हमसफ़र
तो क्या
मंजिले मिट जायेंगी ?


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Sunday, 8 January 1978

तुम्हारी मांग का सिन्दूर भर दू

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जो जुदाई तुमने चाही
वो तुम्हे मिल चुकी है ,

तेरे - मेरे मिलन की
उम्मिद्के शोले
ठंडे हो चुके है ;

अगर चाहो तो इसकी ख़ाक से
तुम्हारी मांग का सिन्दूर भर दू

फिर बिदाई
जो मैंने चाही
मुज़े दे दो ,

तुम्हारे आंसू ओ को
कोई गलत नहीं समज़ेगा


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