Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Saturday, 30 September 1978

तो तुम्हारा क्या कसूर ?


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हमने जो चाहा
जब जब चाहा ,

ना मिला ,
तुम्हारा इस में क्या कसूर ?

      तुम नसीब थी ;

      दो ही कदम आगे थे
      हम तुमसे --

खड़े होकर , पकड़ना था
हमें तुम्हारी कलायियो  को ;

      हम चलते रहे
      तुम्हारी - मेरी राहें ना मिली ,
      तो तुम्हारा क्या कसूर ?

अब तुम कहाँ नसीब ?

      कुछ ज़माने के असूल है ;

      ख्वाब जो हमने देखा
      कुछ तुम्हारी
      कुछ मेरी , भूल है



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Tuesday, 19 September 1978

तुम्हारे बिना


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तुम कहेती हो

" तुम्हारा
  मेरे जहां से ,
  कोई वास्ता नहीं " ;

मैं सोचता हूँ ,

" तुम्हारे बिना
  मेरा तो कोई
  जहां ही नहीं  ! "


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Saturday, 16 September 1978

कौन है हम


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तुमे ना ही सही
मुज़े चाहिए
खुद की वफ़ाओ के सबूत  ---

दिल्फरोशो की दुनिया में
कौन है हम ,
फरहाद शीरीं के ,
के है हम फ़ालतू  ?


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Tuesday, 12 September 1978

फिर क्यूँ रुके रखहा है


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तुम जानती हो
खुद तो हमारी हो नहीं शकती -

फिर क्यूँ रुके रखहा है
हमें ?

हमारे  लहू से
मौत की तो मांग भर जयींगी !



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