Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Sunday, 15 December 1985

पैरो पे क्या महेंदी लगाईं हैं !


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जब महेफिल खत्म हुई
तब फर्श पर गिरे हुए
उठा लिए मैंने
दो फूल  ;

शायद तुम्हारे गले से गिरे थे -

शायद मेरे दिल से
फूल बन कर गिर गये
मेरी आरज़ू और अरमां  ;

और ज्युंकी ये खून से पले थे
इन्हें रौंदते
तुम्हारे पैरों को तो
कहीं खून के दाग
लग नहीं गए ?

किसी और की महेफिल बनाने जाओगी
तो लोग कहेंगे ,

" वाह  खूब ,
  पैरो पे क्या महेंदी लगाईं हैं  ! "

तुम नाचती रहो
मैं ऊठाता रहूँगा फर्श से,

खून से सींचा हुआ
मोगरा और चम्पा 

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15  Dec   1985

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Saturday, 28 September 1985

तेरे मेरे दरमियाँ


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तेरे मेरे दरमियाँ
एक ज़िन्दगी और
दो  मौत का फांसला हैं

हर सुबहा  की एक शाम होती हें

तब ये सोच के मन को  सराहता हूँ की
चलो, फांसला कुछ तो कट गया !

फिर गमों के अन्धेरोवाली रात मै
कराहता हूँ की
अब तो बहुत फांसला रह गया !

परबत होता तो तूफां होके  टकरा जाता ,
मगर ये तो
दुनियाँ की रसमों का दरियाँ हैं
तेरे मेरे दरमियाँ ;

ये तय नहीं कर पायेंगे इस  जनम  में
मेरे कसमों की कश्ती को
तुम्हारे प्यार का पतवार हैं ?

मगर जब
हर शाम की सुबह होती हैं
तब लगता हैं फांसला उतना ही बाकी हैं
जितना एक ज़िन्दगी
और दो  मौत के बीच

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28  Sept  1985


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Saturday, 20 July 1985

मुज़े कबूल है मेरी गुस्ताखी


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अबतक तो आँखों की पलकों पर
हमें उठाये हुए हो ;

अगर आँखे बन्ध कर दोगी
तो हम कहाँ जाके गिरेंगे  ?

हमने तो खौसला पहेले से ही
जला रखहा है ,

अब चाहो तो पांखे भी जला दो  !

तुम्हारे चाहने वाले अगर सैंकड़ो है
तो बस इतना ही समजलो तो काफी है
की
हम उनमे से एक है  ;

मुज़े कबूल है मेरी गुस्ताखी ,
इसकी सज़ा शायद तुम न दे पाओगी  ;

और अपने आपको क्या सज़ा दु  ?
बहुत पहिले ही ख़ुदकुशी कर चूका हूँ  ;

फिर भी द्रोणाचार्य की तराह
तुम भी तुम्हारे अर्जुन के लिए
मेरा अंगूठा मांग शकती हो  --

ये जानते हुए भी की
इसकी जान
अब करीबन जा चुकी हैं  !


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20  July  1985

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आँखों की पलकों पर

अब तक तो आँखों की पलकों पर
हमे उठाये हुए  हो , 
अगर आँखे बंद कर दोगी 
तो हम कहा जाके  गिरेंगे ?

हमने तो  खौसला  पहलेसे ही जला  रखा है 
अब चाहो  तो पंखे  भी जला   दो !

तुम्हारे चाहनेवाले अगर सैंकड़ो है ,
तो बस इतना ही समज  लो तो काफी है 
की हम उन में से एक  है .

मुझे कबूल है मेरी गुस्ताखी 
उसकी सजा शायद तुम न दे पाओगी .
और अपने आप को क्या सजा दूँ ?
बहुत पहले ही ख़ुदकुशी कर चूका हूँ .

फिर भी द्रोणाचार्य की तरह 
तुम भी तुम्हारे अर्जुन के लिए 
मेरा अंगूठा मांग सकती हो -

ये जानते हुए की
इसकी  जान अब करीबन जा चुकी है!


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Thursday, 4 July 1985

रिश्ते


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ऐसे भी कुछ रिश्ते हैं
जो बनाये नहीं जाते
अपने आप बन जाते हैं।

तेरे मेरे बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ -
अब काहे की सफाई ?

अपनोसे भला कोई इन्साफ  मांगता हैं ?

मै तुम्हे गुन्हगारो की तरह
प्यार नहीं करूँगा
क्योंकी मैंने कोई गुन्हा नहीं किया -

फ़िर भी
ज़माने ने उम्र भर की सज़ा
दे ही रख्ही  हैं !

मगर ये जमाना क्या जाने ?

तुम्हारे गमों के भी काबील
अगर तुम हमे समझोगी
तो एक क्या,
हम बार बार की  उम्रकैद के लिए
खुदा  से दुआ  मांगेगे।


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Wednesday, 3 July 1985

अब आगे क्या कहा जाए ?


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अब आगे क्या कहा जाए ?
कहेने को तो बहुत  कुछ  हैं
मगर सुननेवाला भी  तो चाहिए !

सभी को प्यारी हैं
अरमानो के  मचलनेवाली बात -
मेरे पास तो हैं ,
गमों की अँधेरी रातों वाली बात-

काश ! उस बेरहम प्रिया को
इतना तो पता होता
की किस कदर हम उनके
हमसफ़र हैं -

जब  रात  के अँधेरे में
उनका साया भी,
 "सायोनारा " कहे बिना
लौट जाता हैं ,
तब भी हमारी वफायें
उनके  कदमों को चूमती
चली जा रही हैं !

उन्हें जो जी चाहे माने

हम तो खुद को
उनके  हमसफ़र मानकर,
रात के अँधेरे को  पीते जायेंगे।


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Sunday, 21 April 1985

तुम जो आ रही हो !


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फिर एकबार
गुलमोर में फूल आ गए है ,

तुम जो आ रही हो !

कुछ दिन पहेले
इस ज़ाड़ पर
एक सूखी पत्ती भी ना थी ,

आज डाली डाली पर पत्ती है
और पत्ती पत्ती पर फूल है  ;

अगर इन सब को
तुम्हारे आने की प्रतिक्षा हो ,
तो भला , मेरा क्या हाल होगा  ?

मगर
ना तो गुलमोर बोल शकता है
ना मै  ;

उस फूल ,
जो तुम्हारे ओठो की याद दिलाते है
बस उसे बार बार चूम लेता हूँ  ;

जब तुम चली जाओगी
फूल मूर्ज़ा जायेंगे ,

तुम्हारी यादों को
धुन्ढ़ते धुन्ढ़ते ,
मै अकेला
सूने आकाश में उड़ता रहूंगा


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रेल की पटरिया


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मेरे तेरे जीवन के पथ
चले जा रहे है समान्तर ;

जैसे के रेल की पटरिया ,
जो कभी दूसरी पटरिया से जूड जाती है
मगर एक दूजे से नहीं  !

काश !
हम नदि के दो किनारे होते ,

कभी ना कभी
समंदर से मिलके
एक दुसरे को मिल ही जाते  !

अगर हमारा अलग अस्तित्व  है
तो क्या हुआ  ?

अब तो इसी आश में जी रहा हूँ
की
जीते जी जिसे जोड़ ना शके

( कैसे जोड़ते ?
  कितने डिब्बे पटरियों से उछल कर
  छिन्न भिन्न हो जाते ! )

वो दो जीवन के नाम को
मौत के बाद जोड़कर ,

रिश्ते वालो
हमारे उस त्याग की कदर करे ,

जो खुद को जलाके
उनको रौशनी देता रहा


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तुम्हारी उम्र


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तब तुम्हारे बाल
लम्बे , काले  ,  घने थे ,
जब मैंने तुम्हे सबसे पहेले देखा  ;

आज वो बाल नहीं,
मगर तुम्हारी आँखों में
उस दिन ,
जिस प्यार का साया देखा था
वो आज भी है  :

उस गहराइओ में डूब कर
बाहरी दुनिया को ,
करीब करीब भूलसा गया  ;

ये भी के ,
वकत गुजरा चला जा रहा है  ;

ये भी  के ,
तुम्हारे वो काले ज़ुल्फे
कभी
तुम्हारे बदन की सफ़ेदाइओ को चुराके
खुद सफ़ेद हो जायेंगे  --

मेरे खयालो में
तुम्हारी उम्र , अब भी
बीस के आसपास ही है 

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21  April   1985


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मज़ार के उसपार


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क्या करना था ,
क्या कर बैठा  ?

संसार में आकर
सयाना होना था ,
तुम्हे देखते ही
दीवाना हो गया  !

मगर मेरा दीवानापन ,
कोई पहेचाने भी तो
कैसे पहेचाने  ?

सयानेपन की वरदी पहेने हुए हूँ  !

अब तो चंद राते बाकी है ,
शोचता हु तो
जैसे जीवन की
सब बाते बाकी है  !

जिसे पाना था उसे खोकर
लगता है
जिंदगी की सब मुरादे बाकी है  ;

खयालो ही खयालो में
तमन्नाओ की चली बारात
दुल्हन उस दिन भी थी
आज भी हो

तुम्हे कबूल हो तो
मज़ार के उसपार
दीवाने का साथ भी हो  ?


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Sunday, 14 April 1985

ग़मों का ये गुलदस्ता



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कई बाते याद आती है
कुछ कहेने जैसी ,

कुछ
तुम्हारे मुह से फिर एक बार
सुनने जैसी  ;

जिस जगह
मैंने तुम्हे पहेली बार देखा था ,
उस जगह ,

जभी जभी मौक़ा मिले ,
जा कर खडा हो जाता हूँ ,

तुम्हारे खयालो में डूब जाता हूँ  ;

आंसू ओ तो दिखा नहीं शकता
अफ़सोस इस बात का नहीं ,

अगर अफ़सोस है तो ये के
जिस आंसू को सींच कर
बागबान ने
ग़मों का ये गुलदस्ता बनाया,

तुम्हारे जन्मदिन पर भी
इसे
पेश नहीं कर पाता  हूँ  !

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Friday, 12 April 1985

मै उस हवा हूँ



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धरती गगन से प्यार करती है ,
गगन धरती से  ;

मगर
गगन के हाथ नहीं ,
इसलिए गगन ,
धरती के पूरे बदन को
छुए हुए है  ;

मेरे हाथ भी किसी ने काट दिए ,

मैं भी , मनो:मन
तुम्हारे पूरे बदन को
चूमे हुए हूँ  ;

जिस हवा ने तुम्हे घेरा है
मै उस हवा हूँ  ;

खाली बाहरी शरीर को नहीं ,
हर सांस में घूल कर
तुम्हारे अस्तित्व के
हर कोने कोने में
फ़ैल जाता हूँ  ;

तुम्हारी रगरग में
लहू बनके
तुम्हारी रक्षा करूंगा

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Juhu Shack
Mumbai
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12  April  1985


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Wednesday, 13 March 1985

जिन्दगी की डोली


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सुबह हुई
फिर एक बार
काम के नशे में डूब जाऊंगा :

शाम होते  तक
तुम्हारी याद  को छू  न पाऊंगा :

परंतु शाम होते  ही
बस याद  ही याद -
वही पुरानी
 तन्हाईओ वाली बात :

अब तो एक आदतसी हो गई हैं
पूरी एक उम्र ऐसी ही कट गई हैं :

अगर गम मिला तो गम ही सही

मेरी जिन्दगी की डोली पर चढ़के
काली चुनरियाँ ओढ़
कभी होली भी चली हैं

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13  March  1985


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Thursday, 24 January 1985

तुम्हारे नाम का जाम



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आजकल शाम
कुछ देर से आती है ,
दिनभर
तुम्हारी आवाज़
सुनाई नहीं देती है  ;

मगर जब काम से लौटता हूँ
तो
डूबते सूरज को देख कर ,
तुम्हारे नाम का ,
जाम पी लेता हूँ  ;

और उस अंजाम के ख्वाब में
खो जाता हूँ ,
जहाँ
मेरे हाथ में हाथ लिए ,
तुम खड़ी  हो ;

आकाश में
एक सन्नाटा सा है ,
सागर स्तब्ध है ,
हवा मौन है ,
और
सूरज को जैसे
छुपने के लिए कोई जगह नहीं  !

सारी  दुनिया देख रही है के
उसका नंगा बदन
मेरे लहू से लाल है  !

हर शाम ,
मैं
तुम्हारे नाम का
जाम पी लेता हूँ