Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Tuesday, 23 June 2015

रात



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रात की  करू क्या बात

ये भी एक नदी हैं  ,



शयन पर सोया हैं साजन


उसपार ,




इतना नज़दीक


पर जैसे कोशो दूर हैं


बीचमे बहे


अमास के अंधियारे



तुम्हारे ह्रदय की गहराईओं से


छलकते जो नीर ,



मेरे दिल में 
उतर जाते हैं




पर मेरा दिल 
नहीं भरता ,

 


मेरे आश की मटकी


अब भी खाली हैं 

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Original Gujarati / 28  April  1979

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Hindi Translation  /  23  June  2015

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