Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Monday, 22 June 2015

क्या तुम्हारे दिल में भी कभी




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Original Gujarati / 28  April  1978
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फूल खिले थे -

पर्बतों के सीने चिर कर
कभी गुल खिले थे

मेरे ह्रदय की गहराईओं में
प्यार की बुलबुल गुनगुनाई

मगर तब तुम खामोश थी

तुम्हारी खामोशी से टकरा कर
मेरी आवाज़ भी लौट आई  !

बसंत क्या करे  ?

मेरे मन के खंडहर में लहरा कर
बसंत क्या करे  ?

अब बुलबुल खामोश हैं  !


बिखरे हुवे
गुलों की पत्ततिओं को
गिनता हूँ मैं

जो संवर सके
संवरता हूँ मैं

और सोचता हूँ

क्या तुम्हारे दिल में भी कभी
प्यारके मेरे
गुल खिले थे  ?

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Hindt transliteration on 17  June  2015

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