Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Monday, 29 June 2015

वहीँ मेरा रेन बसेरा




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जब सूख कर 
बिखर गए 
गुल्मोर के पत्ते ,

तब पिप्पल में 
नयी कूंपळे आई ,

जानती हो 
कैसा है मेरा मन का फागन  ?
जैसा है भीख मांगता मांगन 



बैशाख की आग में 
जलता हुआ 
मगर शीत महल के ख्वाब को 
सवंरता हुआ  !

मेरी तो 
आँखों की पलकों में ,

जैसे नाचे 
मरुभूमि में ,
मृगजल के अफ़साने  !

मैं तो कहूँ 
गुल्मोर है मेरा ,
जहां तुम 
वहीँ मेरा रेन बसेरा

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Original Gujarati / 13  April   1980

Hindi Translation /  30  June  2015 

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