Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Monday, 28 December 2015

सभी तो अपने ही थे !



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ना तुम कर पायी
ना मै कर पाया
रिश्तो का सौदा  ;

किस का सहारा छोड़के
किस का बन पाते  ?

सभी तो अपने ही थे  !

उनके भी कुछ
सपने भी थे  !

न तुम कर पाई
न मैं कर पाया
सपनो का सौदा  !

क्या बिरानो से हो शकता है
बहारों का सौदा  ?

दीवारो तो गिरा शकते थे
मगर
उस खड़र में क्या सो पाते  ?

गीला करे तो तक़दीर का
मुक्कदर से शिकवे सिवा
क्या और कुछ कर पाते  ?

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29   Dec   2015

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