Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Thursday, 21 December 2017

कैसी है ये भूलभलैया



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डर  है ,

चलते चलते थका जिस्म ,
क्या रूह भी थक जाएँगी ?

डरावनी ये राहे  
मेरे विश्वास को 
क्या कम कर पाएंगी  ?

घिरा  हूँ चारो तरफ 
ऊँची दिवारो  से ,

कौन सी ये 
भंवर में फ़सा हूँ ?

कैसी है 
ये भूलभलैया  ?

जहाँ जाऊ 
वहाँ दिवार ही दिवार है  !

कौन सी इस गर्दिश में 
फंसा हूँ ,

जहां से 
रूह को निकलने का 
कोई रास्ता ही नहीं  !

ऊपर उठने के बजाय 
ख्यालों 
क्या डूबते जायेंगे  ?

ये क्या 
अंत की शुरुआत है  ?

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From original "  Let the Soul Succumb "  of  18  April  1960

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