Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Saturday, 17 November 2018

आप ही हो !

And from her " Occasion-appropriate " compilation , here is what Bharati wrote for me , on our 59th Wedding Anniversary  [  17  Nov  2018  ]   :


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हमारी मुस्कुराहट की 
वजह आप हो  !

हमारे लिए बहोत ख़ास 
आप हो  !


हमे मिली जब भी 
कोई ख़ुशी ,

हम सोचेंगे 
दुआ करने वाले 
आप ही हो  !


Monday, 29 October 2018

उम्र भर चिपका रहूँगा !

मेरे गीत सुर को ढूंढते है
और सुर ढूंढते है
सुरा को ,

न मैं ढूंढता हूँ सुर को
ना सूरा को ,

कहाँ है मेरी साकी  ?

साकी,  

तेरे गाल को 
मान के गुलाब लाल 
तितली ने चूमा 

पर तितली है बेवफा  !

उड़ जाएँगी ,

छोड़ के गुलाब ,
चंपा से आंखे लड़ाएगी  !


मै हूँ 
तुम्हारे चिबूक पर चिपका 
काला तिल 

मेरी वफ़ा को 
समजो ना गलत ,

उम्र भर चिपका रहूँगा  !


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30  Oct  2018 ( DP )



Saturday, 20 October 2018

हमारे उम्र की राहें

तूने तो दी हंसी , 
बार बार,

फिर भी मेरे दिल का जाम क्यों खाली  ?

अब तो उस क़यामत का
इंतज़ार है ,

जब मेरे गमो के जाम
तुम्हारे लबो तक
पहुँच पाए  !

हमारे उम्र की राहें 
अलग थी ,

पर ज़िंदगी की राहें 
कहीं न कहीं ,
ज़माने से छुपके 
मिलती रही  !

अब 
ना तो वो मिलेंगी 
ना कभी बिछड़ेंगी ,

मैं तो उस उम्र को रोता  हूँ 
जो आते आते ही 
ज़िंदगी की राहों में 
भटक गई  !

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21  Oct  2018  ( DP )





Friday, 31 August 2018

कुछ चला भी तो कैसे

Hindi transliteration ( 31 Aug 2018 ) of original Gujarati 

પછાડે પછાડે તારી {  27  April 2018  } 


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कुछ चला भी तो कैसे

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संसार का सूरज सुलगता था ,
मानो तुज पर 
आग बन के 
आभ से बरसता था  !

चाहा तो खूब 
होता अगर पेड़ पलाश का ,
छाव बन कर छा जाता  ;

कुछ चला भी तो कैसे  !

बन के परछाई तेरी 
पीछे पीछे  !

तू रूप की रानी 
और मै  चला 
बन के तेरी 
परछाई काली  ;

जब शाम ढले , 

और चले 
सूरज सागर में 
सो जाने ,

तब उठा लेना मुझे जमीं से ,
सिमट कर पल्लू में तेरे 
दामन में तेरे 
रात भर 
बाँध रखना !  

Sunday, 26 August 2018

अरे , देखने दो !

ख्वाबो में छलक जाते है 
पैमाने अरमाओ के ,

दिन होते ही 
हर मैखाने में 
पीता हूँ जाम , ग़मो के  !

क्या ज़माने से डर  के 
कहेती हो ? ,

"  छोडो मेरा हाथ 
    कोई देख लेगा   "

अरे , देखने दो  !

दिल से जो पकड़ा था 
दामन तेरा ,
वो तो 
आज भी मैंने 
छिपा रख्हा है  !

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27  Aug  2018  ( DP )





Saturday, 11 August 2018

क्या करोगी मुझे पसंद ?

तुम तो वही चाहोगी 
जो मुझे पसंद हो ,

'गर कहु के 
मुझे तो एक तुम्ही पसंद हो 

तो क्या 
खुद को चाहोगी  ?

न कर पाओगी  !

जो मुझे ना हो शके बर्दास्त ,
वो कैसे कर पाओगी  ?

कभी वो तो करके देखो 
जो तुम्हे खुद को पसंद हो  !

क्या ये भी पूछना पड़ेगा 
" क्या करोगी मुझे पसंद ? "

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11  Aug  2018 ( DP )





Thursday, 26 July 2018

आँखों से ही कहे दो

इक दिन सुब्हा 
तूने कहा :

" कुछ कहोगे भी तो ? "

कहने को तो बहुत था 
कुछ कह न पाया  !

मेरे प्यार को बयाँ करने ,
होठो पर 
एक भी 
शब्द न आया  !

मानो 
युद्ध के मैदान में 
अर्जुन के हाथ से 
गांडीव सरकता रहा ,

ना एक 
तीर चला पाया  !

पर उन्हें तो 
सहारा था कृष्ण का  !


वो कौन सी मजबूरी थी 
जिसका   
अफ़सोस उठाये 
मैं आज भी भटकता हूँ  ?


इस सोच में डूबा हूँ 
क्यों न तूने कहा ,

" 'गर बयाँ न कर पाओ लब्ज़ो में ,
   आँखों से ही कहे दो ,
    तुम क्या हो मेरे "

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27  July  2018 ( DP )   








Tuesday, 24 July 2018

तेरे लबो को छू ने

हज़ारो ख़याल आते है 
रुक कर , पल दो पल 
चले जाते है  !

रुका है सिर्फ एक 
तेरी छवि बन के ;

वो छवि 
जिसे देखने 
ढलते सूरज की किरणे भी 
थम गयी ;

पिप्पल के पत्तो से गुजर 
वो किरणे 
तेरे चेहरे पर 
धुप छाँव खेलती रही ;

तेरे हसीं होठो को 
मैं आज भी तरसता हूँ 

तेरे लबो को छू ने 
मैं आज भी मरता हूँ  !

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24  July  2018  ( DP )


मेरा प्यार आज भी कायम है !

रहा न तेरा हुश्न कायम 
ना मेरी जवानी ;

आज बादल बरस रहे है 
समंदर की मौजे गरज रही  है  ;

'गर तू हयां होती 
तो 
मेरी आंखोमे आँखे 
जांख कर देख लेती ,

मेरा प्यार 
आज भी कायम है  !


कल रात 
मेरे ख्वाबोंमें तू आ न पायी 

इसका गीला किस्से करूँ  ?


जी चाहता है 
'गर मिल शको तो 
समंदर की बाँहों में 
आके मिलु  !

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Park Hayatt /  Goa  /  22  July  2018

Monday, 19 March 2018

ये भी तो सोचो



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चंपा से गिरा एक फूल 
वो  चमेली  ने  झेला ,

चमेली खिल उठी  !

अगर तुम्हारी पलकों से 
गिरा मेरा दिल 
तो क्या दामन पर ज़ेलोगी  ?

ये भी तो सोचो 
दामन कैसा झूम जायेगा  !

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20  March  2018

Monday, 5 March 2018

ज़ख्म गहरे होते चले है



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अब दिल थक चुका है  ;

वो जानता है उस मालिक को 
जो बंधनो को काटता है ,

मगर मानता है उस को 
जो बंधनो से बांधता है  -

जिसकी ज़ंजीरो ने 
उम्र को जकड रख्हा है ;

और जिसके घाव से 
ज़ख्म गहरे होते चले है ;


क्या आएगा कभी 
वो समय 
जो 
मरहम लगाएगा  ?

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05  March  2018

From original "  Enslaving Master " of  25  May  1959

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Wednesday, 14 February 2018

क्यों चुप रही ?



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इक सवेरे आके,

नींद से जगा के 
तूने पूछा ,

" तुझे क्या चाहिए  ?  "

आँखों में तेरी जांख  के 
मैँ बोला ,

" देख रही जो ख्वाब ,
मुझे वो ख्वाब चाहिए  "

क्यों चुप रही ?

हो शके तो लौटा दो ,


नींद से भी लंबा 
उस  ख्वाब के इंतज़ार में  ,

समंदर से चौड़ी 
चादर लिए 
मैं सोया हूँ 

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15  Feb  2018 / f 


Monday, 12 February 2018

मैं आ गई हूँ !



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ज़रूर कुछ देर से आयी 
पर आयी जरूर ;

उषा के आने के पहले 
तेरे आने का इंतज़ार था  !

देख ,
क्या लाया हूँ तेरे लिए ,

जिस चंपा की कलिओं को 
भवंरों का इंतज़ार था  !

लिए हाथों में माला 
मैं देखता रहा 
मेरी कुटिया के दरवाजे खड़ा ;

वन से गुज़रती 
उन अकेली राह को 
झांखता रहा  ;

शोचा ,
तुम आओगी 
तब किस बहारों का 
गीत गाओगी  ?

होगा क्या 
जलवा तुम्हारा ,
गुलाब की पांखडिओं पर चमकता ,
कोहरा के बूँद जैसा  ?

पर वहाँ तो चुपकी थी ,
'गर कुछ था 
तो मेरे तन्हा दिलकी 
गहराईओं में घूमते 
ख्यालों का आवाज़  !


आते आते ,
तूने बहुत देर कर दी  !


जब मेरी बंद आँखों को 
तूने ओठ से चूमा ,


तब मानो 
किसी ने जगा कर ख्वाब से 
कहा ,

"  मैं आ गई हूँ  !  "

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13  Feb  2018  /  f

from original "  I am here  "  of 18  May 1959  

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Monday, 5 February 2018

लहरे


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लहरे 

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किये नसीब ने क्रूर वार 
और किये भी तो बार बार  ;

कभी छोटी 
तो कभी मोटी ,
उठी लहरे , जल जीवन में 
सभी थम जाएँगी ;

बचा है जो जुलूम 
वो तो कभी न रुक पायेगा  !

दिल खुद पर करता है जो वार 
उसे कौन समझायेगा  ?

दुश्मन ,
जो दिन में दीखता नहीं 
और रात की तन्हाइयो में 
घेरता है  !

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06  Feb  2018

From original " Ripples " of 18  Dec  1957  / f 

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Thursday, 25 January 2018

चलदो फिर से कारवां


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फिर से एक बार 
चलदो , कारवां 
अनजानी राह पर 
चलना है तुझे ,

जाना है तुझे 
उस मंज़िल पर 
जिसकी 
न तुझे पहचान है  !

सोना है 
उन सितारों के बिच 
जिसका न कोई आसमान है  !

चलदो फिर से कारवां 
न तुझे रुकना है ,

सुलगते सूरज के निचे 
तुझे 
बस चलते रहना है  !

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26  Jan  2018 / f

from original " Roll  Again ,  Wagon  "  of  Nov  1959

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Tuesday, 23 January 2018

मैं कौन हूँ ?


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मुझे बचाओ  !

मानो हज़ारो दुनिया 
मुझ पर टूट पड़ी है  ;

कोई अन्धुनि 
कोई बहारकी 
तो कोई , दूर दरार की  !

और जिसने 
मुझे बाँध रख्हा है 
वो मेरी 
आज और काल की  ;

ये कैसा घमासान है ?

भागते खयालातों का 
बिना मतलब 
सवालातों का ?

मन की पटल पर 
हर पल बदलते 
रंगो की ये बिछात का  ?

जहां 
हर पेड़ एक दुनिया है 
उस जंगलो में 
कब तक घूमता रहूँगा  ?

लब्ज़ो से बनी  है 
ये असंख्य दुनिया ,
विचारो , सुविचारों , कुविचारों की 
धारा  से 
बनी है  ये दुनिया  !

ये कौन सा दयार हैं ?

कौन सी 
द्वैत - अद्वैत की जाल में 
फसा हूँ  ?

जहां प्रेम भी है 
धिक्कार और तिरस्कार भी ,

विधानों की 
बिन पूछे निदानो की ,
बहती है 
निरंतर धारा ;

पहुंचे नज़र  जहां तक 
लगी है कतारों ,

बेखुद बन्दों 
और दिल से बदसूरत 
गवाँरो की ;

ये कैसा फसा हूँ मैं ,
आकाऱ और निराकार के बिच ,
सच और सपनो के बिच  ?

मैं कौन हूँ  ?

आत्मा हूँ 
या अंकगणित का 
कोई समीकरण  ?

क्या हो भी शकता हूँ 
जिनो से बना  सर्व व्यापी डीएनए  ?

भुत हूँ ?
अद्भुत हूँ  ?
या प्रगणापारमिता  ?

जो किसी ने जाना नहीं 
पहचाना नहीं 
क्या मै 
वो अनजान तो नहीं  ?

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24  Jan  2018 / f

From original " Who  Am  I  ?  "  of  11 May  1969

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Wednesday, 17 January 2018

मत उठाओ मुझे



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गिरा एक फूल 
तेरे ज़ुल्फो से ,

लगा चूमने 
कदम तेरे ,

क्यों उठा लिया ?

तेरी आँखों से 
अश्क बन 
' गर गिरु मैं 
पलकों से ,

क्या पहुँच पाउँगा 
तेरे पैरों तक  ?

मत उठाओ मुझे ;


रास्ते में जहाँ रुक गया ,
वहीँ रहने दो  ,

बदन पे हीं बहने दो  !

मुझे पैरों की 
चाहत नहीं  !

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18  Jan  2018  /  f 

Monday, 15 January 2018

किसे देख रही थी



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छुपके ज़माने से 
देख लेता हूँ हर शाम 
तेरी छवि ;

किसे देख रही थी 
तिरछी नज़र  ?

वहां तो मैं था 
और तू थी  !

मुझे तो आज भी 
इंतज़ार है ,
छवि से निकल कर आओगी ,

लिखे 
रंग लेके लाल ,
ओठ पर तेरे ,

अफ़साने वो लेकर 
मुझे इस अकेलेपन से 
छुड़ाओगी  ;

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16  Jan  2018  / f



Wednesday, 10 January 2018

बिन बादल आकाश से



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एक तन्हा पिप्पल की छाँव में 
पड़ा है जो 
उस से भी अकेला पत्थर ,
मानलो उसे मेरा दिल  ;

यहाँ से लेकर जहाँ 
पथरों के पहाड़ 
आसमां को चूमने 
तरसते है ,

जहां ,
बिन बादल आकाश से 
सूरज की आग 
लपकती है ;

वहां तक 
ज़मीं नहीं ,
मेरा जिस्म फैला हुआ है  ;

जिस्म जो 
आभ को नहीं 
तुम्हे तरसता है  !

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11  Jan  2018  /  f

from original " Cloudless Sky " of 17  Oct 1955

Tuesday, 9 January 2018

चंपा के दो फूल



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जब मैं चल दूंगा कल 
तब तुम रोती होगी ;

पर 
ये भी तो सोचो 
जीवन है कितना सुन्दर  ;

देखो 
उम्र आयी है 
खुशियों के ख़ज़ाने लेकर  ;

मुझे भूल जाना ,
तुम्हे ग़मो छू न पाएंगे ;

सिवा जब ,

मेरी मज़ार पर 
तेरे आँगन में खिले 
चंपा के 
दो फूल  चढ़ाओगी 

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10  Jan  2018  /  f

From original " Lilacs " of 26  March  1964

Monday, 8 January 2018

ज़माना सुन लेगा



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क्या गीत गाऊं  ?

छिपा है हर गीत में 
सपनो का संसार  ;

ऐसी कुछ बहारों के सपने ,
जो 
मेरे बिरानो तक 
पहुँच न पायी ,

बहारों 
जो मुझे छू ना पायी  !

और 'गर गाऊं 
गीत सपनो के ,
ज़माना सुन लेगा ,

सपनो का राज़
कैसे छुपाऊं  ?

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08 / Jan / 2018  / f
( from original " What Shall I Sing ? " of 25/04/1962 ) 

Friday, 5 January 2018

क्यों बार बार



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क्या ये है , मन मेरा ,
या 
आसमानकी आकाशगंगा  ?

ना कोई जाने 
ना परवा किसीको ;

क्यों गवां दू 
आज का दिन  
फ़िज़ूल इन सवालातों से  ?

क्यों न गुज़ारू 
खुशीसे 
इस उम्र के नज़ारे  ?

अनजाने अन्धकार में ,
दिलदार जैसे 
दीवानेपन में  ?

क्यों बार बार 
तोड़के दिल को 
मुरझाऊं  ?

क्यों हज़ार बार 
जल जाऊं  ?

और , हर बार 
जल कर जो बन गई 
दिल की खाक ,

उठ कर वहाँ से ,
क्यों न 
तुम तक पहुँच पाऊं  ?

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From original "  Who  Knows ? " of 22  March  1964 / f 

Monday, 1 January 2018

बिना पूछे !



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मेरे जाने के बाद 
करेगा कौन 
तुम्हे याद  ?

जीने के लिए 
क्या ये बहाना 
काफी नहीं  ?

बीत गई जो पल 
उसे तो बहाना की 
ज़रूर ना थी  !


तो , आनेवाली पल की 
क्यूँ शोचु   ?

बिना पूछे 
उठते है कदम ,

और जब रुकेगे  भी तब 
बिना पूछे  !

मेरा शिकवा तो 
होनी से है, 

हारता रहा हूँ उससे
पर डरता तो नहीं  !

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02  Jan  2018 /  #