Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Thursday, 25 January 2018

चलदो फिर से कारवां


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फिर से एक बार 
चलदो , कारवां 
अनजानी राह पर 
चलना है तुझे ,

जाना है तुझे 
उस मंज़िल पर 
जिसकी 
न तुझे पहचान है  !

सोना है 
उन सितारों के बिच 
जिसका न कोई आसमान है  !

चलदो फिर से कारवां 
न तुझे रुकना है ,

सुलगते सूरज के निचे 
तुझे 
बस चलते रहना है  !

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26  Jan  2018 / f

from original " Roll  Again ,  Wagon  "  of  Nov  1959

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Tuesday, 23 January 2018

मैं कौन हूँ ?


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मुझे बचाओ  !

मानो हज़ारो दुनिया 
मुझ पर टूट पड़ी है  ;

कोई अन्धुनि 
कोई बहारकी 
तो कोई , दूर दरार की  !

और जिसने 
मुझे बाँध रख्हा है 
वो मेरी 
आज और काल की  ;

ये कैसा घमासान है ?

भागते खयालातों का 
बिना मतलब 
सवालातों का ?

मन की पटल पर 
हर पल बदलते 
रंगो की ये बिछात का  ?

जहां 
हर पेड़ एक दुनिया है 
उस जंगलो में 
कब तक घूमता रहूँगा  ?

लब्ज़ो से बनी  है 
ये असंख्य दुनिया ,
विचारो , सुविचारों , कुविचारों की 
धारा  से 
बनी है  ये दुनिया  !

ये कौन सा दयार हैं ?

कौन सी 
द्वैत - अद्वैत की जाल में 
फसा हूँ  ?

जहां प्रेम भी है 
धिक्कार और तिरस्कार भी ,

विधानों की 
बिन पूछे निदानो की ,
बहती है 
निरंतर धारा ;

पहुंचे नज़र  जहां तक 
लगी है कतारों ,

बेखुद बन्दों 
और दिल से बदसूरत 
गवाँरो की ;

ये कैसा फसा हूँ मैं ,
आकाऱ और निराकार के बिच ,
सच और सपनो के बिच  ?

मैं कौन हूँ  ?

आत्मा हूँ 
या अंकगणित का 
कोई समीकरण  ?

क्या हो भी शकता हूँ 
जिनो से बना  सर्व व्यापी डीएनए  ?

भुत हूँ ?
अद्भुत हूँ  ?
या प्रगणापारमिता  ?

जो किसी ने जाना नहीं 
पहचाना नहीं 
क्या मै 
वो अनजान तो नहीं  ?

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24  Jan  2018 / f

From original " Who  Am  I  ?  "  of  11 May  1969

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Wednesday, 17 January 2018

मत उठाओ मुझे



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गिरा एक फूल 
तेरे ज़ुल्फो से ,

लगा चूमने 
कदम तेरे ,

क्यों उठा लिया ?

तेरी आँखों से 
अश्क बन 
' गर गिरु मैं 
पलकों से ,

क्या पहुँच पाउँगा 
तेरे पैरों तक  ?

मत उठाओ मुझे ;


रास्ते में जहाँ रुक गया ,
वहीँ रहने दो  ,

बदन पे हीं बहने दो  !

मुझे पैरों की 
चाहत नहीं  !

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18  Jan  2018  /  f 

Monday, 15 January 2018

किसे देख रही थी



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छुपके ज़माने से 
देख लेता हूँ हर शाम 
तेरी छवि ;

किसे देख रही थी 
तिरछी नज़र  ?

वहां तो मैं था 
और तू थी  !

मुझे तो आज भी 
इंतज़ार है ,
छवि से निकल कर आओगी ,

लिखे 
रंग लेके लाल ,
ओठ पर तेरे ,

अफ़साने वो लेकर 
मुझे इस अकेलेपन से 
छुड़ाओगी  ;

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16  Jan  2018  / f



Wednesday, 10 January 2018

बिन बादल आकाश से



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एक तन्हा पिप्पल की छाँव में 
पड़ा है जो 
उस से भी अकेला पत्थर ,
मानलो उसे मेरा दिल  ;

यहाँ से लेकर जहाँ 
पथरों के पहाड़ 
आसमां को चूमने 
तरसते है ,

जहां ,
बिन बादल आकाश से 
सूरज की आग 
लपकती है ;

वहां तक 
ज़मीं नहीं ,
मेरा जिस्म फैला हुआ है  ;

जिस्म जो 
आभ को नहीं 
तुम्हे तरसता है  !

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11  Jan  2018  /  f

from original " Cloudless Sky " of 17  Oct 1955

Tuesday, 9 January 2018

चंपा के दो फूल



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जब मैं चल दूंगा कल 
तब तुम रोती होगी ;

पर 
ये भी तो सोचो 
जीवन है कितना सुन्दर  ;

देखो 
उम्र आयी है 
खुशियों के ख़ज़ाने लेकर  ;

मुझे भूल जाना ,
तुम्हे ग़मो छू न पाएंगे ;

सिवा जब ,

मेरी मज़ार पर 
तेरे आँगन में खिले 
चंपा के 
दो फूल  चढ़ाओगी 

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10  Jan  2018  /  f

From original " Lilacs " of 26  March  1964

Monday, 8 January 2018

ज़माना सुन लेगा



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क्या गीत गाऊं  ?

छिपा है हर गीत में 
सपनो का संसार  ;

ऐसी कुछ बहारों के सपने ,
जो 
मेरे बिरानो तक 
पहुँच न पायी ,

बहारों 
जो मुझे छू ना पायी  !

और 'गर गाऊं 
गीत सपनो के ,
ज़माना सुन लेगा ,

सपनो का राज़
कैसे छुपाऊं  ?

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08 / Jan / 2018  / f
( from original " What Shall I Sing ? " of 25/04/1962 ) 

Friday, 5 January 2018

क्यों बार बार



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क्या ये है , मन मेरा ,
या 
आसमानकी आकाशगंगा  ?

ना कोई जाने 
ना परवा किसीको ;

क्यों गवां दू 
आज का दिन  
फ़िज़ूल इन सवालातों से  ?

क्यों न गुज़ारू 
खुशीसे 
इस उम्र के नज़ारे  ?

अनजाने अन्धकार में ,
दिलदार जैसे 
दीवानेपन में  ?

क्यों बार बार 
तोड़के दिल को 
मुरझाऊं  ?

क्यों हज़ार बार 
जल जाऊं  ?

और , हर बार 
जल कर जो बन गई 
दिल की खाक ,

उठ कर वहाँ से ,
क्यों न 
तुम तक पहुँच पाऊं  ?

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From original "  Who  Knows ? " of 22  March  1964 / f 

Monday, 1 January 2018

बिना पूछे !



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मेरे जाने के बाद 
करेगा कौन 
तुम्हे याद  ?

जीने के लिए 
क्या ये बहाना 
काफी नहीं  ?

बीत गई जो पल 
उसे तो बहाना की 
ज़रूर ना थी  !


तो , आनेवाली पल की 
क्यूँ शोचु   ?

बिना पूछे 
उठते है कदम ,

और जब रुकेगे  भी तब 
बिना पूछे  !

मेरा शिकवा तो 
होनी से है, 

हारता रहा हूँ उससे
पर डरता तो नहीं  !

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02  Jan  2018 /  #