Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 31 August 2018

कुछ चला भी तो कैसे

Hindi transliteration ( 31 Aug 2018 ) of original Gujarati 

પછાડે પછાડે તારી {  27  April 2018  } 


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कुछ चला भी तो कैसे

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संसार का सूरज सुलगता था ,
मानो तुज पर 
आग बन के 
आभ से बरसता था  !

चाहा तो खूब 
होता अगर पेड़ पलाश का ,
छाव बन कर छा जाता  ;

कुछ चला भी तो कैसे  !

बन के परछाई तेरी 
पीछे पीछे  !

तू रूप की रानी 
और मै  चला 
बन के तेरी 
परछाई काली  ;

जब शाम ढले , 

और चले 
सूरज सागर में 
सो जाने ,

तब उठा लेना मुझे जमीं से ,
सिमट कर पल्लू में तेरे 
दामन में तेरे 
रात भर 
बाँध रखना !  

Sunday, 26 August 2018

अरे , देखने दो !

ख्वाबो में छलक जाते है 
पैमाने अरमाओ के ,

दिन होते ही 
हर मैखाने में 
पीता हूँ जाम , ग़मो के  !

क्या ज़माने से डर  के 
कहेती हो ? ,

"  छोडो मेरा हाथ 
    कोई देख लेगा   "

अरे , देखने दो  !

दिल से जो पकड़ा था 
दामन तेरा ,
वो तो 
आज भी मैंने 
छिपा रख्हा है  !

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27  Aug  2018  ( DP )





Saturday, 11 August 2018

क्या करोगी मुझे पसंद ?

तुम तो वही चाहोगी 
जो मुझे पसंद हो ,

'गर कहु के 
मुझे तो एक तुम्ही पसंद हो 

तो क्या 
खुद को चाहोगी  ?

न कर पाओगी  !

जो मुझे ना हो शके बर्दास्त ,
वो कैसे कर पाओगी  ?

कभी वो तो करके देखो 
जो तुम्हे खुद को पसंद हो  !

क्या ये भी पूछना पड़ेगा 
" क्या करोगी मुझे पसंद ? "

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11  Aug  2018 ( DP )