Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Sunday, 26 March 2017

इक लंबी डगर चाहिए !



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न कर पाया जल्दबाजी 
तुम्हारे प्यारमे ,

मेरी आहों को भी 
फुरसत चाहिए  !

कैसे छिपा रखहू 
गमो के अँधेरे में 
तन्हाइयो को  ?

उन्हें भी तो 
कोई सहारा चाहिए  ;

बची हुयी 
तुम्हारी यादों को 
बसरने 
इक उम्र से क्या होगा  ?

मेरे अश्को को गुजरने ,
खयालो की 
इक लंबी डगर चाहिए  !

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27  March  2017

Monday, 20 March 2017

कर निनाद कलकल



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कर निनाद कलकल ,
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कभी खो जाता हूँ ,

ह्रदय की अँधेरी गहराई ओ में
गोते लगाके ढूंढता हूँ
कुछ कांकरे :

उस अतित की वादियो में ,
जहां
कर निनाद कलकल ,
बहे थे रम्य झरने !

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રહ્યાં કંકરો

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કદી હું સરી જાઉં છું ,
દઈ ડૂબકી હૃદય જલ તલ માં ,
અંધાર ભેદી શોધવા ,
રહ્યાં કંકરો ;

જ્યાં વહ્યા'તા
અતીત ના રમ્ય ઝરણો
નાદ કિલકીલે .

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Lawrence ( Kansas ) / 21 Mar 1956

Hindi Transliteration / 21 March 2017

Sunday, 19 March 2017

क्या तुम्हें पहना सकु ?



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क्या तुम्हें पहना सकु ?

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कुछ साल पहले 
एक ख़याल था ,

घूंघट उठाके तेरा 
नज़रे मिलाने का ,
एक ख्वाब था  !

अब ए उम्र तो पूरी होने चली ,

नयी उम्र की ख्वाहिश लेके 
चला हूँ  !

आकाश जैसी नीली ,
मेघ ने जिसे चूम लिया हो 
उस धरती जैसी हरियाली ,
मानो ,
नदी में नहा के निकली हुयी 
उषा जैसी शर्मीली ,
खुद मेरे हाथो से रंगी ;


एक चूनरी 
क्या तुम्हें पहना शकु ?

"गर चाहो तो 
मेघ - धनु के रंगों से रंगी 
कंचूकी 
तुम्हे पहना शकु ?

तू हो 
मेरे गांव से गुजरती सरिता ,

तेरी गोद में 
शर छुपाके सोने का 
ख्वाब लिए चला हूँ ;

नयी उम्र का 
नया ख़याल लेके चला हूँ   


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Hindi Transliteration / 20 March 2017

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Original Gujarati  / Lucknow  /  28  Sept  1988 

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તારે ખોળે સૂઈ જાઉં ?


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તારો ઘૂંઘટ ઉઠ્હાવવાના સપના માં 
એક ઉમ્ર પૂરી થવા આવી ;

હવે એક નવી ઉમ્ર ની ખ્વાહીશ 
જ્યાં તને ,
ચુંદડી ઓઢાડવા આવીશ ;

મારા હાથે રંગી 
નિલા આભ ની વાદળી 
શર્મિલી ઉષા ની ગુલાબી ,

મેઘે ચૂમી ધરતી ની હરિયાળી ,

તને ગમે છે તે 
મેઘધનુ ની કંચૂકી ;

તું છો 
મારે ગામને ગોંદરે વહેતી 
સરિતા ,

તારે ખોળે સૂઈ  જાઉં  ?

Wednesday, 15 March 2017

किस रस्ते से तू गुजरी ?



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जिस पड़ाव को 
तूने 
मंज़िल माना  ,
मुझे भी तो 
वहाँ तक ही जाना  !

किस रस्ते से तू गुजरी  ?

बिना नैन कैसे देखु ,
तेरे पैरों के निशाँ  ?

पर कानो में मेरे 
तेरे पायल की झंकार 
अभी भी गूंजती हैं  ;

राह तो वो भी दिखा शकति हैं  !


' गर राह अँधेरी है 
तो मुझे क्या फर्क  ?

मुझे तो काफी है 
उस महक ,
जो तेरे ज़ुल्फो में  लगे 
फूलों से उठती है  !

गुज़ारिश है 
तो ज़माने से ,
अंधा समझ 
कोई मेरा हाथ ना पकडे  ;

कैसे लिख पाउँगा 
इन नगमे ,
अगर हर पत्थर पर 
ठोकर न खाऊंगा  ?

पढ़ तो लोंगे ,
'गर 
सुनाएगा कोई 
तो सुन भी लोंगे ,


क्या समझ पाओगे  ?

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16  March  2017





Friday, 10 March 2017

कल कभी न आयी !



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क्यों कहा तूने ,
" कल मिलूंगी " ?

सुबह से लेके 
शाम तक ,
आज तो कटती नहीं  !

शाम होते होते ,
शोचता हूँ ,
चलो जैसे वैसे 
एक और दिन कट  गया  !

तुझे क्या मालुम ,
आज की राह पर चलते 
कितने पत्थरो पे 
तेरा नाम लिख्हा  !

गिनते गिनते ,
वो भी तो अब 
पहाड़ बन गया  !

पर 
कल कभी न आयी !

हर सुबह 
आँख खुलते ही
फिर एकबार 
आज ही आयी  !

भरोसा जो बचा है 
तुम्हारे वादे का नहीं ;

खुद की वफाओं का है  !


तुम जो कहे न पायी 
उसे छिपाने का है  !

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 11  March  2017

Friday, 3 March 2017

हर अश्क के जाम पर



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ये सच है की 
तेरा  नाम लेके ,
तेरा गुणगान गाके ,
तुझे भूलने वाले 
अनेक है  ;

कभी ये सोचा ,

बुरा या भला 
तुझे चाहने वाला ,
तेरी याद में 
आंसू बहाने वाला 
एक ही तो है !

उस भीड़ में मुझे मत ढूंढो ,
जहाँ मदिरा पिके 
जुमने वालों की 
महफ़िल लगी है  !

मैं उन्हों में नहीं  !

'गर ढूंढना है तो 
उन तन्हाइयो में ढूंढो ,
जहाँ जाम तो ज़रूर है ,
पर मदिरा के नहीं  !

हर अश्क के जाम पर 
तेरा नाम लिखने वाला 
तो एक ही है  !

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04  March  2017