Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 22 December 2017

क्यों चल दी अकेले ?



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बात इक रात की 

सपनो में हुई 
इक मुलाकात की ;

पता नहीं 
तुम कैसी थी ,
आँखे जो बंद थी   !

खुले कानो ने सुना ,

" ले चल मुझे ,  साजन ,

   मधुकुंज में ,

शिप्रा नदी के तरंगो से टकराके 
आता है जो अनिल
मेरे 
आँचल को 
उड़ाता है जो अनिल ,

ले जा मुझे 
उस उपवन में ,

बहारे जहां 
करती है 
इंतज़ार मेरा 
और तेरा  "

फिर 
क्यों चल दी अकेले  ?

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23  Dec  2017






   

Thursday, 21 December 2017

दिल से वादा !

                                      https://youtu.be/wGLfmikT73A


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तेरे प्यार के शोले 
दिल में मेरे 
जलते रहेंगे  ;

किया है मैंने 
दिल से वादा  !

जब तक जीयु 
तेरी यादो की 
गलियों में घुमू  ,

इस बात का 
किया है 
दिल से वादा  

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From original , " Your  Memory "  of  29  Aug  1953

आसमां का आँचल



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दूर ,

जहां धरती आकाश को मिलने 
तड़पती है ,

वहाँ 
सूरज छूपने चला  ;

मानो ,

आसमां का आँचल 
धरती को छू ने चला  !

और 
छू ते ही उठा 
धरती के दिल से ,

इक गीत अनूठा ,

पहुंचे नजर वहाँ तक 
हरी वादियों में 
गीत मेरा लहराया  

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From  original " Song Eternal " of 31 Aug  1953


कैसे सम्भालूं ?



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क्षितिज के उस पार से 
आता है इक आवाज़ ;

प्रिये ,

तेरे आवाज़ के 
तीरों से घायल 
इस दिल को ,
कैसे सम्भालूं  ?

इन गहरे ज़ख्मो को 
कैसे संवारु  ?

तेरी यादो से जल कर 
खाक हुआ ये दिल ;

जो मेरे रूह से उठा है 
तुम ही 
वो गीत हो  !

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Fom Original , "  My Song Eternal "  of  29  Jan  1952

कैसी है ये भूलभलैया



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डर  है ,

चलते चलते थका जिस्म ,
क्या रूह भी थक जाएँगी ?

डरावनी ये राहे  
मेरे विश्वास को 
क्या कम कर पाएंगी  ?

घिरा  हूँ चारो तरफ 
ऊँची दिवारो  से ,

कौन सी ये 
भंवर में फ़सा हूँ ?

कैसी है 
ये भूलभलैया  ?

जहाँ जाऊ 
वहाँ दिवार ही दिवार है  !

कौन सी इस गर्दिश में 
फंसा हूँ ,

जहां से 
रूह को निकलने का 
कोई रास्ता ही नहीं  !

ऊपर उठने के बजाय 
ख्यालों 
क्या डूबते जायेंगे  ?

ये क्या 
अंत की शुरुआत है  ?

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From original "  Let the Soul Succumb "  of  18  April  1960

Sunday, 17 December 2017

अलविदा कहना चाहु



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जो 
प्राण से भी प्यारी है 
उस प्रिया के दामन पर 
रख कर मेरा शर ,

ज़ालिम इस जहाँ से 
चलना चाहु 
और 
अलविदा कहना चाहु 
और 
तुम्हारे अनंत प्रेम का संगीत 
सुनना चाहु ,

तो सुनाओगी  ?

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From original "  Sweeter  than  Life "  of  13  March  1954  /  Anand 

तब मैंने तुम्हे देखा



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कुछ सहमे हुए है
झील दाल के पानी ,

मानो किसीकी आहट सुन ने
ठहर गए है  !

लम्बी हो चली है
परछाइयां घनी
कैलाश की  !

तब मैंने तुम्हे देखा
प्रिये  !

नील आसमान के रंगो में
और
उन खुश्बुओ में
जो
उन रंगो के साथ
लहराई  !

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From original "  Message  Divine "  of  15  Feb  1954

तुम्हारे जल्वे से




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तुमने तो भर दिया है
तुम्हारे प्यार से ,

अनंत तक  पसरता
इस निले आसमानको ,

और
मेरे पैरों के निचे फैली
इस धरती की
मिट्टीको  ;

तुम्हारे जल्वे से
मेरा जिस्म
घिरा हुआ है  !

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From original "  The Dust Below "  of  18 March 1954

Monday, 11 December 2017

क्षितिज के पार



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क्षितिज के पार 

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प्रिये  !


प्रतिची के समीर आते है 

वो मुझे बुलाते है ,

क्षितिज के उस पार 

मुझे ले जाने आते है ;

उसे मनाना मुमकिन नहीं ,


देखा जो जलवा तेरा 

वो नज़ारा 
बस देखता ही रहू ,

वो क्या मुमकिन है  ?


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From original english "  Distant  Horizon "  /  23  March  1954 

गर्मिओं की इस दोपहर

                                                              https://youtu.be/sbSYs3zd80k                                                 







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इक हवा का झोंका आया ,

पतझड़ के पत्तों ने जैसे
कोई गीत गाया  !

मुझे आज भी याद है ,

वो दिन ,
झलक ना रही जिसकी ,

मुझे आज भी याद है वो दिन


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From Original English , "  This  Summer  Noon  "  /  14  March  1954

Sunday, 10 December 2017

समय के समीर !



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जब 
ना रहे फूलों मे  खुशबू 
और आसमान  मे  रंग ,

इससे पहले 
छोड़ के इस जहां को  
चलो , हम चले 
साथ साथ  ;

पीछे छूट जायेगी 
कुछ 
रूखी सूखी स्मृतियाँ  ;

पिप्पल के पत्तो की तरह 
दूर दूर उड़ जायेगी 
समय की सीमाओं के पार  !

पत्ते क्या बता पाएंगे 
की 
पिप्पल मे फूल 
कभी न आएंगे  ?

हमारे जीवन के 
अधूरेपन को 
क्या 
स्मृतिओं से भर पाओगी  ?

तो चलो चले 
जब तक हवाओं मे 
तेरे मेरे 
गीत लहराते है ,

और 
घु घु करते कबूतर के पंख  की 
नजाकत 
तेरे गालों से 
शरमाती है  !

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Transliteration from original English poem ( Winds of Time / 18 Oct  1988 )


Friday, 8 December 2017

तुम्हे जगा न पाया !



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जब मैं आया तब तुम सोयी थी ,

तुम्हे जगा न पाया 
मन ही मन पुकारता रहा  !

आज जब बिस्तर पर लेटता हूँ 
तब 
तुम्हारी यादोंको 
साथ लेके सोता हूँ ,

पुकारने से क्या 
तेरी याद उठ जाएगी ?

आज भी अफ़सोस 
उन मज़बूरी का है ,

मेरी उन कमज़ोरी का हैं ,

तुम्हे जगा न पाया  !

'गर कुछ जफ़ा की 
खुद से की ,

तेरी वफाओं का जवाब 
मेरे पास नहीं  

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09 Dec  2017