Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Tuesday, 23 December 1986

सुबहा होते ही


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जाम की तो बात ही छोडो ,
महेफिल में
तुम तो आँखे भी उठा न पायी ,

साकी ,

खाली प्याला मैंने उठाया
गले से आवाज़ न आयी  !

तरसता ही रहाँ
जिंदगी के बिराने में ,

सिसकता ही रहा ,

अंधेरो के सहारे
गमो का जाम पीता ही रहा
खुदबखुद मरता रहा  ;

अब महेफिले - रात कम बाकी हैं

सुबहा होते ही
तुम्हे मेरी बांहों में सोना है
मुज़े , तुम्हारे बालों के साये में  ;

फिर कभी ना रात आयेंगी
ना महेफिल  ;

दिलवालों अगर छोड़ जायेंगे
गुलाब ,
हमारी कब्र पर ,

बहारों में
हमारी जान फ़ैल जाएँगी

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23   Dec  1986

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Thursday, 6 November 1986

अँधेरे में मिल जाओगी


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मेरी जिंदगी पर
शायद
तुम्हारा कोई हक्क न रहा ,

मगर कैसे बताऊ की
( कोई पूछे भी तो ना  ? ),

मेरी मौत पर किसी और का
अधिकार नहीं  ;

जिस दिए में
तुम्हारे प्यार का तेल है
उसे तुम्ही बूज़ा पाओगी  ;

उजाले में जिसे न मिल शकी
उसे
अँधेरे में मिल जाओगी  ;

अफ़सोस ये नहीं के ज़माना
ना समज पाया मेरे अफसाना ,

गिला इस बात का है के
तुम्हारे आंसू ओ को भी
ना पि शका   !

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06  Nov  1986

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Sunday, 5 January 1986

तो क्या शोले शबनम हो जायेंगे ?


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जिस बालू की दिवार में बंधा हूँ
वो तो खुद मैंने ही बनाई है ,

और अब चाहता हूँ की
तुम उसे तोड़ दो  !

ये सवाल अबतक तुमने उठाया नहीं
मगर तुम्हे हक्क है के पूछो ,

"  दिन के उजाले में जब मैंने बिज बोया
   तब तो मेरा हाथ थाम कर रोक न शके  -

   अब चाहते हो की इस बगिया को
   मेरे ही हाथो से उखाड़ कर फेंक दू  ?  "

तुम्हारे सीने से फ़टकर ,
ज्वालामुखी
शायद शांत हो गया हो -

संसार के संबंधो से शायद
तुम्हारे प्यार ने हार मान ली  ;

-- मैं कभी हार नहीं मानूंगा ,

रेत की दीवाल से
एक एक कण उठाके ,
गमो के दरिये में
बहा दूंगा  ;

मेरे सीने में सुलगते शोले को
अगर तुम देख न पाओ ,

तो क्या
शोले शबनम हो जायेंगे  ?

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05  Jan  1986

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मैं धुआं हु


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कहानी में होते है
नायक , खलनायक और,
बहुत ही सुन्दर ,
गुडिया जैसी
एक नायिका  :

    तुम गुडिया जरुर हो ,
    मगर ये कहानी नहीं ,
    होनी है  ;

जिसकी कोई नायिका नहीं ,
ऐसी एक जिंदगानी है ;

और अभी तक
तय नहीं कर पाया
की ,
मैं नायक हु
या खलनायक  !

कभी कभी
ऐसा अहेसास होता है की
मैं धुआं हु  --

मेरे अस्तित्व में
जिसने जो चाहा ,
वो देख लिया  ;

    क्या किसीने ये भी सोचा की
    जिस आकार लेकर
    मैं उनके सामने आया ,
    वो मैं नहीं हूँ  ?

हरपल नया आकार पाकर
ऊपर उठता जा रहा हूँ ,

    जितनी देर तुम्हारे बांहों में बाँध शको
    उतनी देर तुम्हारा हूँ

-- बाकि हूँ अनहोनी  !

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05  Jan  1986

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